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Siraj (Story) : Saadat Hasan Manto

नागपाड़ा पुलिस चौकी के उस तरफ़ जो छोटा सा बाग़ है। उस के बिलकुल सामने ईरानी के होटल के बाहर, बिजली के खंबे के साथ लग कर ढूंढ़ो खड़ा था। दिन ढले, मुक़र्ररा वक़्त पर वो यहां आ जाता और सुबह चार बजे तक अपने धंदे में मसरूफ़ रहता।

मालूम नहीं, उस का अस्ल नाम क्या था। मगर सब उसे ढूंढ़ो कहते थे, इस लिहाज़ से तो ये बहुत मुनासिब था कि उस का काम अपने मुवक्किलों के लिए उन की ख़्वाहिश और पसंद के मुताबिक़ हर नसल और हर रंग की लड़कियां ढूंढता था।

ये धंदा वो क़रीब क़रीब दस बरस से कर रहा था। इस दौरान में हज़ारों लड़कियां उस के हाथों से गुज़र चुकी थीं। हर मज़हब की, हर नस्ल की, हर मिज़ाज की।

उस का अड्डा शुरू से यही रहा था। नागपाड़ा पुलिस चौकी के उस तरफ़। बाग़ के बिलकुल सामने। ईरानी होटल के बाहर बिजली के खंबे के साथ…….. खंबा उस का निशान बन गया था। बल्कि मुझे तो वो ढूंढ़ो ही मालूम होता था।

मैं जब कभी उधर से गुज़रता और मेरी नज़र उस खंबे पर पड़ती। जिस पर जगह जगह चूने और कथ्थे की उंगलियां पोंछी गई थीं तो मुझे ऐसा लगता कि ढूंढ़ो खड़ा है और काले काँडी और सेंके ली सूपारी वाला पान चबा रहा है।

ये खंबा काफ़ी ऊंचा था। ढूंढ़ो भी दराज़क़द था…….. खंबे के ऊपर बिजली के तारों का एक जाल सा बिछा था। कोई तार दूर तक दौड़ता चला गया था और दूसरे खंबे के तारों के उलझाओ में मुदग़म हो गया था। कोई तार किसी बडिंग में और कोई किसी दुकान में चला गया था। ऐसा लगता था कि इस खंबे की पहुंच दूर दूर तक है। वो दूसरे खंबों से मिल कर गोया सारे शहर पर छाया हुआ है।

इस खंबे के साथ टेलीफ़ोन के महकमे ने एक बक्स लगा रखा था जिस के ज़रीये से वक़्तन फ़वक़्तन तारों की दुरुस्ती वग़ैरा की जांच पड़ताल की जाती थी। अक्सर सोचता था कि ढूंढ़ो भी इसी क़िस्म का एक बक्स है जो लोगों की जिन्सी जांच पड़ताल के लिए खंबे के साथ लगा रहता है।

क्योंकि उसे आस पास के इलाक़े के इलावा दूर दूर के इलाक़ों के उन तमाम सेठों का पता था जिन को वक़्फ़ों के बाद या हमेशा ही अपनी जिन्सी ख़्वाहिशात के तने हुए या ढीले तार दरुस्त कराने की ज़रूरत महसूस होती थी।

उसे उन तमाम छोकरियों का भी पता था जो इस धंदे में थीं। वो उन के जिस्म के हर ख़द्द-ओ-ख़ाल से वाक़िफ़ था। उन की हर नब्ज़ से आश्ना था। कौन किस मिज़ाज की है और किस वक़्त और किस गाहक के लिए मौज़ूं है। उस को इस का ब-ख़ूबी अंदाज़ा था। लेकिन एक सिर्फ़ उस को सिराज के मुतअल्लिक़ अभी तक कोई अंदाज़ा नहीं हुआ था। वो उस की गहराई तक नहीं पहुंच सका था।

ढूंढ़ो कई बार मुझ से कह चुका था। “साली का मस्तक फिरे ला है…….. समझ में नहीं आता मंटो साहब, कैसी छोकरी है…….. घड़ी में माशा घड़ी में तोला…….. कभी आग, कभी पानी। हंस रही है। क़हक़हे लगा रही है……..लेकिन एक दम रोना शुरू कर देगी…….. साली की किसी से नहीं बनती…….. बड़ी झगड़ालू है। हर पसैंजर से लड़ती है।

साली से कई बार कह चुका कि देख, अपना मस्तक ठीक कर, वर्ना जान जहां से आई है…….. अंग पर तेरे कोई कपड़ा नहीं…….. खाने को तेरे पास डीढ़या नहीं…….. मारा मारी और धांदली से तो मेरी जान काम नहीं चलेगा…….. पर वो एक तुख़्म है। किसी की सुनती ही नहीं”
मैं ने सिराज को एक दो मर्तबा देखा है। बड़ी दुबली पतली लड़की थी मगर ख़ूबसूरत…….. उस की आँखें ज़रूरत से ज़्यादा बड़ी थीं। ऐसा लगता था कि वो उस के बैज़वी चेहरे पर सिर्फ़ अपनी बड़ाई जताने की ख़ातिर छाई हुई हैं। मैं ने जब उस को पहली मर्तबा क्लीयर रोड पर देखा था तो मुझे बड़ी उलझन हुई थी।

मेरे दिल में ये ख़्वाहिश पैदा हुई थी कि उस की आँखों से कहूं कि भई तुम थोड़ी देर के लिए ज़रा एक तरफ़ हट जाओ ताकि में सिराज को देख सकूं। लेकिन मेरी इस ख़्वाहिश के बावजूद जो यक़ीनन मेरी आँखों ने उस की आँखें तक पहुंचा दी होगी, वो इसी तरह इस के सफ़ैद बैज़वी चेहरे पर छाई रहीं।

मुख़्तसर सी थी, मगर इस इख़्तिसार के बावजूद बड़ी जामे मालूम होती थी। ऐसा लगता था कि वो एक सुराही है जिस में एक हजम से ज़्यादा पानी मिली हुई शराब भरने की कोशिश की गई है और नतीजे के तौर पर सय्याल चीज़ दबाओ के बाइस इधर उधर, तड़प कर बह गई है।

मैं ने पानी मिली हुई शराब इस लिए कहा है कि उस में तल्ख़ी थी, वो जो तेज़-ओ-तुंद शराब की होती है, मगर ऐसा लगता था किसी धोके बाज़ ने इस में पानी मिला दिया है, ताकि मिक़दार ज़्यादा हो जाये। मगर सिराज में लिसानियत की जो मिक़दार थी, वैसी की वैसी मौजूद थी ।

और इस झुंझलाहट से जो उस के घने बालों से उस की तीखी नाक से, उस के भिंचे हुए होंटों से और उस की उंगलियों से, जो नक़्शा-नवेसों की नोकीली और तेज़ तेज़ पैंसिलें मालूम होती थीं, मैं ने ये अंदाज़ा लगाया था कि वो हर चीज़ से नाराज़ है। ढूंढ़ो से……..

उस खंबे से जिस के साथ लग कर वो खड़ा रहता था…….. उन ग्राहकों से जो उस के लिए लाए जाते थे……..अपनी बड़ी बड़ी आँखों से भी जो उस के सफ़ैद बैज़वी चेहरे पर क़ब्ज़ा जमाए रखती थीं।

उस की पतली पतली, नोकीली उंगलियां जो नक़्शा-नवेसों की पैंसिलों की तरह तेज़ थीं। ऐसा मालूम होता था कि वो उन से भी नाराज़ है। शायद इस लिए कि जो नक़्शा सिराज बनाना चाहती थी वो नहीं बना सकती थीं।

ये तो एक अफ़्साना निगार के तअस्सुरात में जो छोटे से तिल में संग-ए-अस्वद की तमाम सख़्तियां बयान कर सकता है…….. आप ढूंढ़ो की ज़बानी सिराज के मुतअल्लिक़ सुनिए उस ने मुझ से एक दिन कहा। “मंटो साहब…….. आज साली ने फिर टंटा कर दिया…….. वो तो जाने किस दिन का सवाब काम आ गया और आप की दुआ से यूं भी नागपाड़ा चौकी के सब अफ़्सर मेहरबान हैं, वर्ना कल ढूंढ़ो अन्दर होता…….. वो धमाल मचाई कि मैं तो बाप रे बाप कहता रह गया।”

मैं ने उस से पूछा। “क्या बात हुई थी?”

“वही जो हुआ करती है…….. मैं ने लाख लानत भेजी अपनी हश्त पुश्त पर कि हरामी जब तू इस छोकरी को अच्छी तरह जानता है तो फिर क्यों उंगली लेता है…….. क्यों उस को निकाल कर लाता है। तेरी माँ लगती है या बहन…….. मेरी तो कोई अक़ल काम नहीं करती मंटो साहब!”

हम दोनों ईरानी के होटल में बैठे थे। ढूंढ़ो ने कॉफ़ी मिली चाय पिर्च में उंडेली और सड़प सड़प पीने लगा। “अस्ल बात ये है कि साली से मुझे हमदर्दी है।”
मैं ने पूछा। “क्यों?”

ढूंढ़ो ने सर को एक झटका दिया। “जाने क्यों…….. ये साला मालूम हो जाये तो ये रोज़ का टंटा ख़त्म न हो।

“फिर उस ने एक दम पिर्च में प्याली औंधी कर के मुझ से कहा। “आप को मालूम है…….. अभी तक कुंवारी है।”
यक़ीन मानिए कि मैं एक लहज़े के लिए चकरा गया। “कुंवारी।”


“आप की जान की क़सम”
मैं ने जैसे उस को अपनी बात पर नज़र-ए-सानी करने के लिए कहा। “नहीं ढूंढ़ो।”
ढूंढ़ो को मेरा ये शक ना-गवार मालूम हुआ “मैं आप से झूट नहीं कहता मंटो साहब…….. सोला आने कुंवारी है…….. आप मुझ से शर्त लगा लीजिए।”

मैं सिर्फ़ इसी क़दर कह सका। “मगर ऐसा क्यों कर हो सकता है।”

ढूंढ़ो ने बड़े वसूक़ के साथ कहा। “ऐसा क्यों होने को नहीं सकता…….. सिराज जैसी छोकरी तो इस धंदे में भी रह कर सारी उम्र कुंवारी रह सकती है……..साली किसी को हाथ ही नहीं लगाने देती…….. मुझे उस की सारी हिस्री मालूम नहीं…….. इतना जानता हूँ।

पंजाबन है……..लेमंगटन रोड पर मेम साहब के पास थी। वहां से निकाली गई कि हर पैसन्ज़र से लड़ती थी। दो तीन महीने निकल गए कि मडाम के पास दस बीस और छोकरिया थीं …….. पर मंटो साहब कोई कब तक किसे खिलाता है…….. उस ने एक दिन तीन कपड़ों में निकाल बाहर किया……..यहां से फ़ारस रोड में दूसरी मडाम के पास पहुंची। वहां भी उस का मस्तक वैसे का वैसा था।

एक पैसन्ज़र के काट खाया…….. दो तीन महीने यहां गुज़रे…….. पर साली के मिज़ाज में तो जैसे आग भरी हुई है अब कौन उसे ठंडा करता फिरे…….. फिर ख़ुदा आप का भला करे, खेत वाड़ी के एक होटल में रही…….. पर यहां भी वही धमाल…….. मैनेजर ने तंग आ कर चलता किया…….. क्या बताऊं मंटो साहिब। न साली को खाने का होश है न पीने का……..

कपड़ों में जुएँ पड़ी हैं। सर दो दो महीने से नहीं धोया…….. चरस के एक दो सिगरेट मिल जाएं कहीं से तो फूंक लेती है…….. या किसी होटल से दूर खड़ी हो कर, फ़िल्मी रिकार्ड सुनती रहती है।”

मेरे लिए ये तफ़सील काफ़ी थी। उस के रद्द-ए-अमल से मैं आप को आगाह नहीं करना चाहता कि अफ़्साना निगार की हैसियत से ये ना-मुनासिब है।

मैं ने ढूंढ़ो से महज़ सिलसिला-ए-गुफ़्तुगू क़ायम रखने के लिए पूछा। “तुम उसे वापस क्यों नहीं भेज देते। जब कि उसे इस धंदे से कोई दिलचस्पी नहीं…….. किराया तुम मुझ से ले लो!”

ढूंढ़ो को ये बात भी ना-गवार मालूम हुई। “मंटो साहब किराए साले की क्या बात है…….. मैं नहीं दे सकता।”
मैं ने टोह लेनी चाही। “फिर उसे वापस क्यों नहीं भेजते?”

ढूंढ़ो कुछ अर्से के लिए ख़ामोश हो गया। कान में अड़े हुए सिगरेट का टुकड़ा निकाल कर उस ने सुलगाया और धोएं को नाक के दोनों नथुनों से बाहर फेंक कर उस ने सिर्फ़ इतना कहा। “मैं नहीं चाहता कि वो जाये।”
मैं ने समझा। उलझे हुए धागे का एक सिरा मेरे हाथ में आ गया है। “क्या तुम उस से मोहब्बत करते हो?”

ढूंढ़ो पर इस का शदीद रद्द-ए-अमल हुआ। “आप कैसी बातें करते हैं मंटो साहब……..।” फिर उस ने दोनों कान पकड़ कर खींचे। क़ुरआन की क़सम मेरे दिल में ऐसा पलीद ख़्याल कभी नहीं आया…….. मुझे बस…….. ” वो रुक गया। “मुझे बस, कुछ अच्छी लगती है!”
मैं ने बड़ा सही सवाल किया। “क्यों?”

ढूंढ़ो ने भी इस का बड़ा सही जवाब दिया। “इस लिए…….. इस लिए कि वो दूसरों जैसी नहीं……..बाक़ी जितनी हैं। सब पीस की पैर हैं…….. हरामी हैं अव्वल दर्जे की…….. पर ये जो है न…….. कुछ अजीब-ओ-ग़रीब है…….. निकाल के लाता हूँ तो राज़ी हो जाती है…….. सौदा हो जाता है…….. टैक्सी या विक्टोरिया में बैठ जाती है…….. अब मंटो साहब, पैसन्ज़र साला मौज शौक़ के लिए आता है……..

माल पानी ख़र्च करता है…….. ज़रा दबा के देखता है…….. या वैसे ही हाथ लगा के देखता है……..बस धमाल मच जाती है। मारा मारी शुरू कर देती है…….. आदमी शरीफ़ हो तो भाग जाता है। पीए वाला हो …….. या मवाली हो तो आफ़त…….. हर मौक़े पर मुझे पहुंचना पड़ता है……..

पैसे वापस करने पड़ते हैं और हाथ पैर अलग जोड़ने पड़ते हैं…….. क़सम क़ुरआन की सिर्फ़ सिराज की ख़ातिर…….. और मंटो साहब आप की जान की क़सम इसी साली की वजह से मेरा धंदा आधा रह गया है……..!”

मेरे ज़ेहन ने सिराज का जो उक़बा मंज़र तय्यार किया था, मैं इस का ज़िक्र करना नहीं चाहता, लेकिन इतना है कि जो कुछ ढूंढ़ो ने मुझे बताया वो उस के साथ ठीक तौर पर जमता नहीं था।

मैं ने एक दिन सोचा कि ढूंढ़ो को बताए बग़ैर सिराज से मिलूं। वो बाई कल्ला स्टेशन के पास ही एक निहायत वाहियात जगह में रहती थी। जहां कूड़े करकेट के ढेर थे। आस पास का तमाम फुज़्ला था। कारपोरेशन ने यहां ग़रीबों के लिए जस्त के बे-शुमार झोंपड़े बना दिए थे।

मैं यहां उन बुलंद बाम इमारतों का ज़िक्र करना नहीं चाहता जो इस ग़लाज़त-गाह से थोड़ी दूर ईस्तादह थीं। क्योंकि उन का इस अफ़्साने से कोई तअल्लुक़ नहीं। दुनिया नाम ही नशेब-ओ-फ़राज़ का है। या रिफ़अतों और पस्तियों का।

ढूंढ़ो से मुझे उस के झोंपड़े का अता पता मालूम था। मैं वहां गया…….. अपने ख़ुशवज़ा कपड़ों को इस माहौल से छुपाए हुए…….. लेकिन यहां मेरी ज़ात मुअल्लक़ नहीं।

बहर-हाल मैं वहां गया…….. झोंपड़े के बाहर एक बकरी बंधी थी। उस ने मुझे देखा तो मिम्याई। अंदर से एक बुढ़िया निकली…….. जैसे पुरानी दास्तानों के करम-ख़ूर्दा अंबार से कोई कटनी लाठी टेकती हुई……..

मैं लौटने ही वाला था कि टाट के जगह जगह से फटे हुए पर्दे के पीछे मुझे दो बड़ी बड़ी आँखें नज़र आईं……..बिलकुल उसी तरह फटी हुई जिस तरह वो टाट का पर्दा था। फिर मैं ने सिराज का सफेदी बैज़वी चेहरा देखा और मुझे इन ग़ासिब आँखों पर बड़ा ग़ुस्सा आया।

उस ने मुझे देख लिया था। मालूम नहीं अंदर क्या काम कर रही थी। फ़ौरन सब छोड़ छाड़ कर बाहर आई। उस ने बुढ़िया की तरफ़ कोई तवज्जा न दी और मुझ से कहा। “आप यहां कैसे आए?”
मैं ने मुख़्तसरन कहा। “तुम से मिलना था।”
सिराज ने भी इख़्तिसार ही के साथ कहा। “आओ अंदर!”
मैं ने कहा। “नहीं मेरे साथ चलिए।”

इस पर करम-ख़ूर्दा दास्तानों की करम-ख़ूर्दा कटनी बड़े दुकांदाराना अंदाज़ में बोली। “दस रुपय होंगे।”
मैं ने बटवा निकाल कर दस रुपय इस बुढ़िया को दे दिए और सिराज से कहा। “आओ सिराज……..!”

सिराज की बड़ी बड़ी आँखों ने एक लहज़े के लिए मेरी निगाहों को रास्ता दिया कि उस के चेहरे की सड़क पर चंद क़दम चल सकें…….. मैं एक बार फिर उसी नतीजे पर पहुंचा कि वो ख़ूबसूरत थी…….. सुकड़ी हुई ख़ूबसूरती। हनूत लगी ख़ूबसूरती। सदियों की महफ़ूज़-ओ-मामून और मदफ़ून की हुई ख़ूबसूरती…….. मैं ने एक लहज़े के लिए यूं महसूस किया कि मैं मिस्र में हूँ और पुराने दफ़ीनों की खुदाई पर मामूर किया गया हूँ।

मैं ज़्यादा तफ़्सील में नहीं जाना चाहता…….. सिराज मेरे साथ थी। हम दोनों एक होटल में थे। वो मेरे सामने, अपने ग़लीज़ कपड़ों में मलबूस बैठी थी और उस की बड़ी बड़ी आँखें उस के बैज़वी चेहरे पर क़ब्ज़ा-ए-मुख़ालिफ़ाना किए थीं। मुझे ऐसा महसूस हो रहा था कि उन्हों ने सिर्फ़ सिराज के चेहरे ही को नहीं, उस के सारे वजूद को ढाँप लिया है कि मैं उस के किसी रोएँ को भी ना देख सकूं।

बुढ़िया ने जो क़ीमत बताई थी, मैं ने अदा कर दी थी। इस के इलावा मैं ने चालीस रुपय और सिराज को दिए थे…….. मैं चाहता था कि वो मुझ से भी उसी तरह लड़े झगड़े, जिस तरह वो दूसरों के साथ लड़ती झगड़ती है।

चुनांचे इसी ग़रज़ से मैं ने उस से कोई ऐसी बात न की जिस से मोहब्बत और ख़ुलूस की बू आए……..उस की बड़ी बड़ी आँखों से भी मैं ख़ाइफ़ था। वो इतनी बड़ी थीं कि मेरे इलावा मेरे इर्द-गिर्द की सारी दुनिया भी देख सकती थीं।

वो ख़ामोश थी……..वाहियात तरीक़े पर उसे छेड़ने के लिए ज़रूरी था कि मेरे जिस्म और ज़ेहन में ग़लत क़िस्म की हरारत हो। चुनांचे मैं ने विस्की के चार पैग पीए और उस को आम पैसेंजरों की तरह छेड़ा। उस ने कोई मुज़ाहमत ना की। मैं ने एक ज़बरदस्त फ़ुज़ूल हरकत की।
मेरा ख़.ल था कि वो बारूद जो उस के अंदर भरी पड़ी है, उस को भक से उड़ाने के लिए ये चिंगारी काफ़ी है। मगर हैरत है कि वो किसी क़दर पुर-सुकून हो गई। उठ कर उस ने मुझे अपनी बड़ी बड़ी आँखों के फैलाओ में समेटते हुए कहा। “चरस का एक सिगरेट मंगवा दो मुझे!”

“शराब पियो!”
“नहीं……..चरस का सिगरेट पियूंगी!”
मैं ने उसे चरस का सिगरेट मंगवा दिया…….. उसे ठेट चरसियों के अंदाज़ में पी कर उस ने मेरी तरफ़ देखा…….. उस की बड़ी बड़ी आँखें अब अपना तसल्लुत छोड़ चुकी थीं……..मगर उसी तरह जिस तरह कोई ग़ासिब छोड़ता है…….. उस का चेहरा मुझे एक उजड़ी हुई, एक बर्बाद-शुदा सलतनत नज़र आया……..ताख़्त-ओ-ताराज मुल्क, उस का हर ख़त, हर ख़ाल……..वीरानी की एक लकीर थी……..

मगर ये वीरानी क्या थी?……..क्यों थी?…….. बाज़ औक़ात ऐसा भी होता है कि आबादियां ही वीरानों का बाइस होती हैं…….. क्या वो इसी क़िस्म की आबादी थी जो शुरू होने के बाद किसी हम्ला आवर के बाइस अधूरी रह गई थी और आहिस्ता आहिस्ता उस की दीवारें जो अभी गज़ भर भी ऊपर नहीं उठी थीं खन्डर बन गई थीं।

मैं चक्कर में था, लेकिन आप को मैं इस चक्कर में नहीं डालना चाहता…….. मैं ने क्या सोचा, क्या नतीजा बरामद किया। इस से आप को क्या मतलब।

सिराज कुंवारी थी या नहीं। मैं इस के मुतअल्लिक़ जानना नहीं चाहता था। सलफ़े के धोएँ में, अलबत्ता उस की मह्ज़ून-ओ-मख़मूर आँखों में मुझे एक ऐसी झलक नज़र आई थी जिस को मेरा क़लम भी बयान नहीं कर सकता।

मैं ने उस से बातें करना चाहीं मगर उसे कोई दिलचस्पी नहीं थी। मैं ने चाहा कि वो मुझ से लड़े झगड़े, मगर यहां भी उस ने मुझे ना-उम्मीद किया।
मैं उसे घर छोड़ आया।

ढूंढ़ो को जब मेरे इस खु़फ़िया सिलसिले का पता चला तो वो बहुत नाराज़ हुआ। उस के दोस्ताना और ताजिराना जज़्बात दोनों बहुत बुरी तरह मजरूह हुए थे। उस ने मुझे सफ़ाई का मौक़ा न दिया। सिर्फ़ इतना कहा। “मंटो साहब आप से ये उम्मीद न थी!” और ये कह कर वो खंबे से हट कर एक तरफ़ चला गया।

अजीब बात है कि दूसरे रोज़ शाम को वक़्त-ए-मुक़र्ररा पर वो मुझे अपने अड्डे पर नज़र न आया। मैं समझा शायद बीमार है। मगर इस से अगले रोज़ भी वो मौजूद नहीं था।

एक हफ़्ता गुज़र गया। वहां से मेरा सुबह शाम आना जाना होता था। मैं जब उस खंबे को देखता। मुझे ढूंढ़ो याद आता। मैं बाई कल्ला स्टेशन के पास ही जो वाहियात जगह थी वहां भी गया। ये देखने के लिए सिराज कहाँ है। मगर वहां अब सिर्फ़ वो करम-ख़ूर्दा कटनी रहती थी। मैं ने उस से सिराज के मुतअल्लिक़ पूछा तो वो पोपली मुस्कुराहट में लाखों बरस की पुरानी जिन्सी करवटें बदल कर बोली। “वो गई…….. और हैं……..मंगवाऊँ!”

मैं ने सोचा, इस का क्या मतलब है। ढूंढ़ो और सिराज दोनों ग़ायब हैं और वो भी मेरी इस खु़फ़िया मुलाक़ात के बाद…….. लेकिन मैं इस मुलाक़ात के मुतअल्लिक़ इतना मुतरद्दिद नहीं था…….. यहां फिर मैं अपने ख़यालात आप पर ज़ाहिर नहीं करना चाहता लेकिन मुझे ये हैरत ज़रूर थी कि वो दोनों ग़ायब कहाँ हो गए।

इन मैं मोहब्बत की क़िस्म की कोई चीज़ नहीं थी। ढूंढ़ो ऐसी चीज़ों से बाला-तर था। उस की बीवी थी बच्चे थे और वो उन से बे-हद मोहब्बत करता था, फिर ये सिलसिला क्या था कि दोनों ब-यक-वक़्त ग़ायब थे।

मैं ने सोचा। हो सकता है कि अचानक ढूंढ़ो के दिमाग़ में ये ख़याल आ गया हो कि सिराज को वापस घर जाना चाहिए। इस के मुतअल्लिक़ वो पहले फ़ैसला नहीं कर सका था, पर अब अचानक कर लिया हो।

ग़ालिबन एक महीना गुज़र गया।
एक शाम अचानक मुझे ढूंढ़ो नज़र आया। उसी खंबे के साथ, मुझे ऐसा महसूस हुआ कि जैसे बड़ी देर करंट फ़ेल रहने के बाद एक दम वापस आ गया है उस खंबे में जान पड़ गई। टेलीफ़ोन के डिब्बे में भी…….. चारों तरफ़, ऊपर तारों के फैले हुए जाल, ऐसा लगता था आपस में सरगोशियां कर रहे हैं।

मैं उस के पास से गुज़रा……..उस ने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराया।
हम दोनों ईरानी के होटल में थे। मैं ने उस से कुछ न पूछा। उस ने अपने लिए कोफ़ी मिली चाय और मेरे लिए सादा चाय मंगवाई और पहलू बदल कर उस ने ऐसी नशिस्त क़ायम की कि जैसे वो मुझे कोई बहुत बड़ी बात सुनाने वाला है, मगर उस ने सिर्फ़ इतना कहा “और सुनाओ मंटो साहब।”
“सुनाएँ ढूंढ़ो……..बस गुज़र रही है।”

ढूंढ़ो मुस्कुराया। “ठीक कहा आप ने……..बस गुज़र रही है…….. और गुज़रती जाएगी……..लेकिन ये साला गुज़रते रहना या गुज़रना भी अजीब चीज़ है…….. सच पूछिए तो इस दुनिया में हर चीज़ अजीब है।“

मैं ने सिर्फ़ इतना कहा। “तुम ठीक कहते हो ढूंढ़ो।”
चाय आई और हम दोनों ने पीना शुरू की। ढूंढ़ो ने पिर्च में अपनी कोफ़ी मिली चाय उंडेली और मुझ से कहा। “मंटो साहब…….. उस ने मुझे बता दी थी सारी बात…….. कहती थी, वो सेठ जो तुम्हारा दोस्त है उस का मस्तक फिरे ला है।”

मैं हंसा। “क्यों?”
“बोली……..मुझे होटल ले गया…….. इतने रुपय दिए……..पर सेठों वाली कोई बात न की।”
मैं अपने अनाड़ी पन पर बहुत ख़फ़ीफ़ हुआ। “वो क़िस्सा ही कुछ ऐसा था ढूंढ़ो”
अब ढूंढ़ो पेट भर के हसा। “मैं जानता हूँ…….. मुझे माफ़ कर देना कि मैं उस रोज़ तुम से नाराज़ हो गया था।” उस के अंदाज़-ए-गुफ़्तुगू में उन-जाने में बे-तकल्लुफ़ी पैदा हो गई। पर अब वो क़िस्सा ख़लास हो गया है!

“कौन सा क़िस्सा?”
“इस साली का सिराज का…….. और किस का?”
मैं ने पूछा। “क्या हुआ?”

ढूंढ़ो गटकने लगा। “जिस रोज़ आप के साथ गई…….. वापस आ कर मुझ से कहने लगी…….. मेरे पास चालीस रुपय हैं……..चलो मुझे लाहौर ले चलो…….. मैं बोला साली, ये एक दम तेरे सर पर क्या भूत सवार हुआव…….. बोली, नहीं।
चल ढूंढ़ो, तुझे मेरी क़सम…….. और मंटो साहब, आप जानते हैं…….. मैं साली की कोई बात नहीं टाल सकता कि मुझे अच्छी लगती है…….. मैं ने कहा चल…….. सो टिकट कटा के हम दोनों गाड़ियों में सवार हुए…….. लाहौर पहुंच कर एक होटल में ठहरे……..मुझ से बोली। ढूंढ़ो।
एक बुर्ख़ा ला दे मैं ले आया…….. इसे पहन कर वो लगी सड़क सड़क और गली गली घूमने…….. कई दिन गुज़र गए……..मैं बोला। ये भी अच्छी रही ढूंढ़ो। सिराज साली का मस्तक तो फिरे ला था। साला तेरा भी भेजा फिर गया जो तू इतनी दूर इस के साथ आ गया ……..मंटो साहिब।

आख़िर एक दिन इस ने टांगा रुकवाया और एक आदमी की तरफ़ इशारा करके मुझ से कहने लगी……..ढूंढ़ो…….. उस आदमी को मेरे पास ले आ…….. मैं चलती हूँ वापस सराय में……..मेरी अक़्ल जवाब दे गई……..मैं टांगे से उतरा तो वो ग़ायब…….. अब मैं उस आदमी के पीछे पीछे……..आप की दुआ से और अल्लाह ताला की मेहरबानी से……..

मैं आदमी आदमी को पहचानता हूँ। दो बातें कीं और मैं ताड़ गया कि मौज शौक़ करने वाला है…….. मैं बोला बंबई का ख़ास माल है…….. बोला, अभी चलो…….. मैं बोला। नहीं पहले माल पानी दिखाओ।

इस ने इतने सॉर्ट नोट दिखाए…….. मैं दिल में बोला…….. चलो ढूंढ़ो……..यहां भी अपना धंदा चलता रहे……..पर मेरी समझ में ये बात नहीं आई थी कि सिराज साली ने सारे लाहौर में इसी को क्यों चुना…….. मैं ने कहा, चलता है……..टांगा लिया और सीधा सराय

सिराज को ख़बर की…….. वो बोली। अभी ठहर……..मैं ठहर गया…….. थोड़ी देर के बाद उस आदमी को जो अच्छी शक्ल का था अंदर ले गया……..सिराज को देखते ही वो साला यूं बिदका जैसे घोड़ा…….. सिराज ने उस को पकड़ लिया।

ढूंढ़ो ने यहां पहुंच कर प्याली से अपनी ठंडी कोफ़ी मिली चाय एक ही जर्रे में ख़त्म की और बीड़ी सुलगाने लगा।मैं ने उस से कहा। “सिराज ने उस को पकड़ लिया।”

ढूंढ़ो ने बुलंद आवाज़ में कहा। “हाँ जी…….. पकड़ लिया उस साले को…….. कहने लगी। अब कहाँ जाता है…….. मेरा घर छुड़ा कर तू मुझे अपने साथ किस लिए लाया था…….. मैं तुझ से मोहब्बत करती थी…….. तू ने भी मुझ से यही कहा था कि तू मुझ से मोहब्बत करता है……..
पर जब मैं अपना घर बार, अपना माँ बाप छोड़ कर तेरे साथ भाग निकली और अमृतसर से हम दोनों यहां आए…….. इसी सराय में आ कर ठहरे तो रात ही रात तो भाग गया…….. मुझे अकेली छोड़ कर……..किस लिए लाया था तू मुझे यहां……..किस लिए भगाया था तू ने मुझे…….. मैं हर चीज़ के लिए तय्यार थी……..पर तू मेरी सारी तैय्यारियां छोड़ कर भाग गया……..आ……..

अब मैं ने तुम्हें बुलाया है…….. मेरी मोहब्बत वैसी की वैसी क़ायम है……..आ…….. और मंटो साहब, वो उस के साथ लिपट गई…….. उस साले के आँसू टपकने लगे……..रो रो कर माफियां मांगने लगा…….. मुझ से ग़लती हुई…….. मैं डर गया था…….. मैं अब कभी तुम से अलाहिदा नहीं हूँगा।

क़स्में खाता रहा…….. जाने क्या बकता रहा…….. सिराज ने मुझे इशारा किया…….. मैं बाहर चला गया……..सुबह हुई तो मैं बाहर खाट पर सो रहा था…….. सिराज ने मुझे जगाया और कहा…….. चलो ढूंढ़ो…….. मैं बोला। कहाँ?…….. बोली, वापस बंबई…….. मैं बोला……..वो साला कहाँ है…….. सिराज ने कहा। सो रहा है…….. मैं उस पर अपना बुर्ख़ा डाल आई हूँ।”

ढूंढ़ो ने अपने लिए दूसरी कोफ़ी मिली चाय का आर्डर दिया तो सिराज अंदर दाख़िल हुई…….. उस का सफ़ैद बैज़वी चेहरा निखरा हुआ था और उस पर उस की बड़ी बड़ी आँखें दो गिरे हुए सिगनल मालूम होती थीं।

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The End

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