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Pakisistani Poet Mustafa Zaidi: Mystry dead body was found next to unconscious girlfriend Shahnaz Gul

पाकिस्तान के बंदरगाह शहर कराची में, एक प्रसिद्ध कवि अपनी प्रेमिका के बेहोश शरीर के पास मृत पाए जाते हैं। यह सन् 1970 का समय है, जब यह शहर अपनी बेकाबू नाइटलाइफ़ और सामाजिक घोटालों के लिए मशहूर था। इस कथित हत्या ने मीडिया में सनसनी मचा दी।

आज हम उसी मुतफ़ा ज़ैदी की रहस्यमयी मौत पर बात कर रहे हैं जिनका ये मशहूर शेर हर उस व्यक्ति के दिल को छूता है जो प्रेम, दोस्ती या किसी रिश्ते में सच्ची परीक्षा और समर्पण की उम्मीद करता है. यह बताता है कि सच्ची मोहब्बत के लिए आसान रास्ते नहीं होते, बल्कि मेहनत, त्याग और मुश्किलों को पार करना पड़ता है.

किसी और ग़म में इतनी खलिशें निहां नहीं है,
ग़म ए दिल मेरे रफ़ीक़ो ग़म ए रायेगां नहीं है ।

किसी आँख को सदा दो, किसी ज़ुल्फ़ को पुकारो,
बड़ी धुप पड़ रही है, कोई सायबान नहीं है ।

मेरे रूह की हक़ीक़त मेरी आंसुओं से पूछो,
मेरा मजलिसी तबस्सुम, मेरा तर्जुमान नहीं है ।

कोई हमनफ़स नहीं है, कोई राज़दां नहीं है,
फ़क़त एक दिल था अब तक, सो वह मेहरबां नहीं है ।

इन्हीं पत्थरों पे चलकर अगर आ सको तो आओ,
मेरे घर के रास्ते में कोई कहकशां नहीं है ।

कवि मुस्तफा जैदी की 1970 में कराची में हुई रहस्यमयी मौत के समय, वह एक सोशलाइट शहनाज़ गुल के साथ बेहोशी की हालत में पाए गए थे, जिससे इस घटना को लेकर हत्या या आत्महत्या की अटकलें लगीं और यह पाकिस्तान के हाई-प्रोफाइल स्कैंडलों में से एक बन गया.

Shahnaz Gul

यह हत्या थी या आत्महत्या, यह तय नहीं हो पाया, हालांकि कुछ लोगों का मानना था कि जैदी अवसाद में थे और खुदकुशी कर सकते थे ।

शहनाज़ गुल: वह एक शादीशुदा महिला थीं और जैदी के साथ उनके रिश्ते को लेकर काफी सनसनी फैली थी. उन पर हत्या का आरोप लगा, लेकिन अदालत उन्हें बरी कर दिया क्योंकि हत्या के सबूत नहीं मिले ।

मुस्तफा जैदी का पालन-पोषण इलाहाबाद में हुआ, जहाँ वे अपने रूढ़िवादी शिया परिवार में विद्रोही स्वभाव के थे। उन्होंने इलाहाबाद के कॉलेजों और विश्वविद्यालय में एक असाधारण छात्र और प्रतिभाशाली कवि के रूप में शुरुआती प्रसिद्धि प्राप्त की।

जब वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य में स्नातक की पढ़ाई कर रहे थे, तब उनके शिक्षक के.के. मेहरोत्रा ने उन्हें विलक्षण प्रतिभा का धनी घोषित किया – एक ऐसा व्यक्ति जिसमें असाधारण क्षमताएँ थीं।

फिर एक दिन, इलाहाबाद के लोगों को पता चला कि मुस्तफा शहर छोड़कर पाकिस्तान चला गया है। उसके पुराने सहपाठी मुहम्मद अकील ने हैरानी जताते हुए कहा, “यह अजीब बात है। जो व्यक्ति पाकिस्तान के बारे में कभी बात तक नहीं करता था, वह वहाँ कैसे चला गया?”

मुस्तफा ने अपने दोस्तों को लिखा कि उसे जाने के लिए मजबूर किया गया था और वह इलाहाबाद लौट आएगा। लाहौर की चकाचौंध, किताबों की दुकानों और मास्टर डिग्री की अंतिम परीक्षाओं की तैयारी के दबाव के बावजूद, मुस्तफा के मन में केवल एक ही बात बार-बार दोहराई जाती थी: सरोज।

मुस्तफा उदास था, इलाहाबाद में पीछे छूटी उस महिला के गम से व्याकुल था: सरोज बाला सरन नाम की एक युवती, जो एक वकील और भावी इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की बेटी थी।
मुस्तफा की मुलाकात सरोज से इविंग क्रिश्चियन कॉलेज में हुई थी और उसे उससे प्यार हो गया था। कुछ समय बाद, मुस्तफा ने “एस” शीर्षक से एक कविता लिखी, जिससे कॉलेज परिसर में चर्चाएं छिड़ गईं, हालांकि किसी को नहीं पता था कि सरोज भी उससे उतना ही प्यार करती थी या नहीं।

लाहौर में, जो इलाहाबाद से एक हजार किलोमीटर से भी अधिक दूर और एक दूसरे देश में स्थित था, मुस्तफा अभी भी सरोज के लिए तड़प रहा था।

उसके दोस्तों ने उसे जितना हो सके उतना समय देने की कोशिश की, कभी-कभी तो वे रात उसके कमरे में ही बिताते थे। मुस्तफा कभी-कभी इतनी पीड़ा से उसका नाम पुकारता था कि ऐसा लगता था मानो वह पूरी तरह से हताश होकर दरवाजे की ओर भाग जाएगा।

Shahnaz Gul

(Aakhri Baar Milo)

“Aakhri baar milo…!
Aakhri baar milo aisay ke jaltay huve dil

Raakh ho jaayein, koyee aur taqaaza na karein
Chaak-e-vaada na silay , zakhm-e-tamanna na khilay

Saans hamvaar rahay , shamma ki lau tak na hilay
Baatein bas itni ke lamhe unhein aa kar gin jaayein

Aankh uthaaye koyi ummeed to aankhein chhin jaayein
Uss mulaqaat ka iss baar koyee veham nahin

Jis se ikk aur mulaqaat ki soorat niklay
Ab na hai jaan o junoon ka na hikayaat ka waqt

Ab na tajdeed-e-wafa ka na shikayaat ka waqt
Luutt gaye shehr-e-havaadis mein mataa’-e-alfaaz

Ab jo kehna hai to kaisay koyi noha kahiye
Aaj tak tum se rag-e-jaan ke kayi rishtay thhay

Kal se jo hoga ussay kaun sa rishtaa kahiye
Phir na dehkein-ge kabhi aariz- o- rukhsaar,…. Milo

Maatami hain dam-e-rukhsat dar o deewaar,….Milo
Phir na ham hongay,

Na iqraar, na inkaar,…. Milo
Aakhri Baar Milo…”

हाँ, मुस्तफ़ा ज़ैदी की मशहूर नज़्म ‘आख़िरी बार मिलो’ उनके जीवन और उनकी रहस्यमयी मौत की ओर इशारा करती है; यह नज़्म उनके दर्द, अकेलेपन और कलात्मक स्वतंत्रता की इच्छा को दर्शाती है, और उनकी मौत की परिस्थितियों से जुड़ी है .

जहाँ वे एक महिला के साथ अचेत पाए गए थे, जिसे कुछ लोग आत्महत्या और कुछ लोग हत्या मानते थे, जो एक दुखद अंत की ओर इशारा करता है, जहाँ उन्हें लगता था कि उन्हें कला और समाज में जगह नहीं मिल रही है।

नज़्म में एक तरह की भविष्यवाणी या अपने अंत का एहसास झलकता है, जहाँ वे कहते हैं कि ‘कल से जो होगा उसे कौन सा रिश्ता कहिए’ और ‘फिर न हम होंगे न इकरार न इनकार मिलो’।

यह नज़्म उनके उस दौर के भावनात्मक उथल-पुथल को दिखाती है, जब उन्हें लग रहा था कि उनकी कला और उनके सपनों को समाज में कोई जगह नहीं मिल रही है और उन्हें एक ‘दुखद अंत’ की ओर धकेल दिया गया है।

संक्षेप में, ‘आख़िरी बार मिलो’ सिर्फ़ एक नज़्म नहीं, बल्कि मुस्तफ़ा ज़ैदी की उस दर्द भरी यात्रा का प्रतिबिंब है जो उनके दुखद और रहस्यमयी अंत की ओर ले गई।

And Zaidi appears to have prematurely captured words for his own obituary .

अदालत ने शहनाज़ को हत्या के इल्ज़ाम से बरी कर दिया.वो शहनाज़ गुल जो पाकिस्तान के अख़बारों के पहले पन्ने पर छाई रहीं, कुछ सालों बाद गुमनामी के अंधेरे में उनकी मौत हो गई.

आज तक पता नहीं चल सका कि मशहूर शायर जोश मलीहाबादी के शागिर्द और फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के दोस्त मुस्तफ़ा हस्नैन ज़ैदी की मौत कैसे हुई.

फ़ोन जिसकी घंटी नहीं बजी


बात 13 अक्तूबर, 1970 की आधी रात की है. कराची के टेलीफ़ोन एक्सचेंज में एक शिकायत आई कि टेलीफ़ोन नंबर 417935 से संपर्क करने की कोशिश हो रही है लेकिन घंटी नहीं बज रही हलाइन चेक करने के बाद शिकायत करने वाले को बताया गया कि फ़ोन इंगेज्ड है . जिस शख़्स से लोग फ़ोन पर संपर्क करने की कोशिश कर रहे थे, उसका नाम सैयद मुस्तफ़ा हस्नैन ज़ैदी था.

 

ज़ैदी ने कुछ दिन पहले ही अपनी 40 वीं सालगिरह मनाई थी. मुस्तफ़ा के एक दोस्त भी उनको फ़ोन लगा रहे थे क्योंकि उनके घर पर एक शख़्स आया था जिसका नाम सलीम था.सलीम की परेशानी ये थी कि उसकी पत्नी पिछले कुछ घंटों से ग़ायब थी. उसकी उम्र 26 साल थी और उसका नाम शहनाज़ गुल था.

सलीम बदनामी के डर से पुलिस को शहनाज़ के ग़ायब होने की ख़बर नहीं देना चाहते थे, उनको लग रहा था कि शहनाज़ शायद मुस्तफ़ा के साथ होगी, इसलिए वे मुस्तफ़ा का पता पूछने शाहिद के घर गए थे.सलीम रात को दो बजे मुस्तफ़ा के घर पहुँचे. उन्होंने चौकीदार से पूछा कि मुस्तफ़ा कहाँ है? चौकीदार ने उन्हें बताया कि वो अपने बेडरूम में सो रहे हैं. दरवाज़ा खटखटाया गया लेकिन अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई.

एयर कंडीशनर चलने की आवाज़ बाहर सुनाई दे रही थी. मुस्तफ़ा की कार गैरेज में खड़ी थी.सलीम ने वो रात बहुत बेचैनी में गुज़ारी. अगले दिन सुबह साढ़े सात बजे एक बार फिर मुस्तफ़ा को फ़ोन मिलाने की नाकाम कोशिश हुई. आख़िरकार पुलिस को इसकी इत्तला दी गई.

जब पुलिस ने दरवाज़ा तोड़ा तो मुस्तफ़ा की लाश बिस्तर पर खून से लथपथ पड़ी थी, ख़ून उनकी नाक और मुँह से निकला था लेकिन शरीर पर कोई ज़ख्म नहीं था. उनके फ़ोन का रिसीवर क्रेडिल पर न होकर नीचे लटका हुआ था.शहनाज़ उनके कमरे के बाहर एक कॉरिडोर में बेहोश पड़ी हुई थीं.
Shahnaz Gul
मौत किसी मामूली आदमी की नहीं थी, कुछ समय पहले तक मुस्तफ़ा लाहौर के ज़िला कमिश्नर हुआ करते थे. साथ ही, उनकी गिनती पाकिस्तान के युवा शायरों में होती थी और मशहूर शायर जोश मलीहाबादी उनके उस्ताद हुआ करते थे.
बेहोश शहनाज़ को तुरंत जिन्ना अस्पताल ले जाया गया. उनके पति सलीम उनके साथ थे. जब मुस्तफ़ा की लाश मिली तो वो नीले रंग की कमीज़ पहने हुए थे जो उनकी पतलून में खुसी हुई थी. उनका बायां हाथ उनके पेट पर था और उनकी कमीज़ के बटन खुले हुए थे.

मुस्तफ़ा के भतीजे शाहिद रज़ा ने अदालत में अपनी गवाही में बताया, “कमरे का फ़र्नीचर अस्त-व्यस्त था. सोफ़ा उल्टा पड़ा था और लैंप गिरा पड़ा था. करीब चार दर्जन नेफ़्थलीन की गोलियाँ बिस्तर और ज़मीन पर बिखरी पड़ी थीं. कुछ गंदे प्याले पड़े थे जिसमें कुछ कॉफ़ी बची हुई थी. फ़ोन के पास नीले रंग की तीन छोटी गोलियाँ थीं और कुछ कागज़ बिखरे पड़े थे जिन पर मुस्तफ़ा जर्मन भाषा के कुछ शब्द लिखने का अभ्यास कर रहे थे.”

एयर कंडीशनर के ऊपर मुस्तफ़ा की छोटी बेटी इस्मत की तस्वीर रखी हुई थी.मुस्तफ़ा की मौत की ख़बर सुनकर जाने-माने शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ भी वहाँ पहुंच गए थे.मुस्तफ़ा की लाश का मुआयना करने वाले डॉक्टर का कहना था कि उनकी मौत 18 से 24 घंटे पहले हुई.

मुस्तफ़ा भारत के इलाहाबाद के रहने वाले थे और पाकिस्तान जाने से पहले तेग़ इलाहाबादी के नाम से शायरी करते थे.

विभाजन के बाद पाकिस्तान आकर पहले उन्होंने एक कॉलेज में पढ़ाया और फिर उनका चयन पाकिस्तान सिविल सेवा में हो गया. 1954 बैच के मुस्तफ़ा ज़ैदी को प्रतिभाशाली अधिकारी माना जाता था और उन्हें उनके काम के लिए ‘तमग़ा-ए-कायद-ए-आज़म’ से सम्मानित किया गया था.

शहनाज़ गुल
जब जिन्ना अस्पताल में शहनाज़ गुल का पेट साफ़ किया गया तो पता चला कि उन्होंने वेलियम से मिलती-जुलती लिब्रियम की गोलियाँ खाई हुईं थीं. उन्होंने पुलिस को बताया कि उन्हें कुछ भी याद नहीं है सिवाय इसके कि वो मुस्तफ़ा से मिलने गई थीं.

अस्पताल में भी उन्होंने वही काले कपड़े पहन रखे थे जिन कपड़ों में वो मुस्तफ़ा के घर पर पाईं गई थीं. उनके बाल बिखरे हुए थे और उनका मुँह सूजा हुआ था.एक दिन बाद उनके पति सलीम उन्हें अस्पताल से डिस्चार्ज कराकर अपने घर ले आए थे.

Mustafa Zaidi and his German Wife
शहनाज़ गुल अपने ज़माने में बहुत हसीन महिला हुआ करती थीं. इस घटना के 54 साल बाद भी लोग कहते हैं कि उन जैसी ख़ूबसूरत औरत पाकिस्तान में किसी ने नहीं देखी है.
उनके पति सलीम उनसे कम-से-कम 30 साल बड़े थे. सलीम की पहली शादी एक अंग्रेज़ महिला से हुई थी. वो पहले भारतीय सेना में हुआ करते थे लेकिन विभाजन के बाद उन्होंने सेना से इस्तीफ़ा दे दिया था. शहनाज़ से शादी के समय उनकी उम्र 46 साल साल थी जबकि शहनाज़ सिर्फ़ 17 साल की थीं.

शहनाज़ को भी शायरी का कुछ हद तक शौक था. पार्टियों में जाना वो पसंद करती थीं. लोग उनके साथ उठना-बैठना पसंद करते थे .

वो कहता है, “धूप मुझे सता रही है। कहीं छांव नहीं है। मेरी प्रेमिका को बुलाओ। उसकी आंखें मुझे पनाह दें।” ऐसी पंक्तियाँ शाहनाज़ गुल जैसी महिलाओं को आकर्षित करती थीं, जो अपनी बड़ी काली आंखों, गुलाबी गालों और एक खास तरह के आकर्षण के लिए मशहूर थीं।

एक पार्टी में हुई मुस्तफ़ा और शहनाज़ की मुलाक़ात
मुस्तफ़ा ज़ैदी जब सिविल सर्वेंट थे तो उनका अक्सर कराची आना-जाना होता था. सिंध क्लब में शहनाज़ और सलीम की पहली मुलाक़ात सैयद मुस्तफ़ा हसनैन ज़ैदी से हुई. मुस्तफ़ा ज़ैदी ने अपने दोस्तों को बताया कि उन्हें शहनाज़ बहुत पसंद हैं.

Shahnaz GUL

मुस्तफ़ा ज़ैदी अपने दोस्तों के साथ जब पिकनिक पर जाते थे तो उनमें शहनाज़ गुल और उनके पति भी होते थे. कई लोगों ने मुस्तफ़ा से कहा भी कि शहनाज़ शादी-शुदा हैं. उनसे संबंध बढ़ाने से पहले ज़रा सोच लें लेकिन मुस्तफ़ा ने किसी की बात मानी नहीं. मुस्तफ़ा को जानने वाले बताते हैं कि वो औरतों के साथ फ़्लर्ट करने के शौकीन थे.

मुस्तफ़ा शहनाज़ को प्यार से लाली बुलाते थे, इसकी वजह ये थी कि वे जब ब्लश करती थीं तो उनके गाल पूरी तरह लाल हो जाते थे.मुस्तफ़ा के दोस्त बताते हैं कि वो औरतों से संबंध बनाकर अपना ईगो बूस्ट करते थे.

उनको शायद ये भी ख़ुशफ़हमी थी कि उनकी जर्मन पत्नी उनकी इस आदत का बुरा नहीं मानेंगी. अपने दोस्तों को अपने विवाहेतर संबंधों के लिए वो बौद्धिक कारण बताया करते थे.

शहनाज़ के ऊपर मुस्तफ़ा ने पाँच नज़्में लिखी थीं. उसमें से एक ‘अपनी जान नज़र करूँ’ उनकी मौत के बाद अख़बार में छपी थी–
मैं अलग हो के लिखूँ तेरी कहानी कैसे
मेरा फ़न, मेरा सुख़न, मेरा क़लम तुझसे है
Mustafa Zaidi with his German Wife and children

मुस्तफ़ा की अलमारी में एक ब्रीफ़केस मिला था जिसमें एक पिस्टल और 25 गोलियाँ रखी हुई थीं. इसके अलावा उसमें छपे हुए पैम्फ़लेट थे जिसका शीर्षक था ‘कराची की क्रिस्टीन कीलर शहनाज़.’ उस पैम्फ़लेट में शहनाज़ की तस्वीरें थीं जिसमें उन्हें कमर से ऊपर नग्न दिखाया गया था.

उनकी मौत से कुछ महीने पहले शहनाज़ यूरोप चली गई थीं. इस दौरान मुस्तफा को लगा कि शहनाज़ का उनके प्रति रवैया बदल गया है. न वो फ़ोन पर बात करती थीं न उनके किसी ख़त का जवाब दे रही थीं. उनको लगा कि शहनाज़ का किसी और शख़्स के साथ संबंध हो गया है. उनका रवैयै ग़ुस्से और बदले की भावना में बदल गया.

मुस्तफ़ा के पास शहनाज़ की कुछ तस्वीरें थीं. उन्होंने कराची की एक प्रिटिंग प्रेस में उनके 4000 पैम्फ़लेट छपवाए. उसमें उन्होंने लिखा, ‘कराची की क्रिस्टीन कीलर.’ उन्होंने लिखा कि वो पाकिस्तान की हाई सोसाएटी और उसके किरदारों को एक्सपोज़ करेंगे. उन्होंने ये छपवाया ज़रूर लेकिन बाँटा नहीं. उन्होंने इन्हें अपने एक दोस्त को दिखाया ज़रूर था लेकिन उन्होंने कहा कि तुम छोड़ दो इन सब चीज़ों को.

शहनाज़ गुल के लिए वो बहुत ही मुश्किल समय था. करीब दो साल तक वो अख़बारों के फ़्रंट पेज पर रहीं. 1970 से लेकर 1972 के बीच तक इनकी शक्ल अख़बारों के फ़्रंट पेज पर होती थी. शहनाज़ हमेशा ख़बरों में बनी रहीं. डॉन और शाम के अख़बारों में उनकी सेक्स लाइफ़ के बारे में बातें होती थीं. उनकी हर चीज़ कवर होती थी.

Mustafa Zaidi and Poet Josh Malihabadi

बरी होने के कुछ दिनों बाद ही उन्होंने सार्वजनिक रूप से बाहर निकलना शुरू कर दिया. बहुत सारे लोगों की हमदर्दी थी उनके साथ. उनको लगता था कि शहनाज़ के साथ बहुत ग़लत हुआ है. इस घटना के बाद जब भी वो किसी पार्टी या रेस्तराँ में जाती थीं या सड़क पर फल ख़रीद रही होती थीं तो लोग रुक कर उन्हें देखते थे.

बाद में उन्होंने कभी सार्वजनिक रूप से मुस्तफ़ा ज़ैदी का ज़िक्र नहीं किया.अब से तकरीबन बीस साल पहले गुमनामी में उनकी मौत हुई. उनकी मौत का ज़िक्र तक अख़बारों में नहीं हुआ. ये वही अख़बार थे जो किसी दौर में उनके बारे में हर छोटी से छोटी चीज़ रोज़ पहले पन्ने पर छाप रहे थे.

जैदी को अपने सपनों की सज़ा मिली, लेकिन वे सपने उनके बाद भी कायम हैं, जो हमें लगातार परेशान करते रहते हैं, हालांकि अक्सर हमारी समकालीन चेतना से परे होते हैं। हम उनकी पीड़ा सहने वाली आत्मा के बहुत ऋणी हैं; जिनमें से एक यह भी है कि हम याद रखें कि उन्होंने मरने का फैसला क्यों किया।

जैदी प्रेम और कलात्मक स्वतंत्रता के लिए तरसते रहे; और अपने सपनों के लिए दंडित हुए। 

The End

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